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Saturday, August 8, 2009

प्रोफ़ेसर का रहस्य, एपिसोड ०३: "रवानगी"

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पिछली कड़ी:
एपिसोड नं. ०२: "बो-स्ट्रीट"
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(अब आगे)
ऐसी कई बातें हैं जिनको लेकर प्रोफ़ेसर से मिलने की मेरी इच्छा प्रबल थी. एक खोजी चैनल के एरिया हेड होने के नाते नित्य नयी रोचक खबरों के लिये धमासान करते रहना मेरी आम दिनचर्या का अंग है. लेकिन एक भारतवंशी प्रोफ़ेसर का इस प्रकार सुदूर अफ़्रीका में बस कर नाम कमाना और फ़िर उनके इर्द-गिर्द रहस्यों का इतना घना आवरण होना भी आकर्षित करने के लिये पर्याप्त कारण थे.

कुछ माह पहले मैंने उनसे संपर्क साधने का प्रयास किया था. मुझे आशा थी कि किसी और वजह से ना सही पर एक भारतवंशी होने के नाते वे शायद मुझसे मिलने को तैयार हो जाएँ. पर मेरी सभी आशाओं पर उस समय कुठाराघात हो गया था जब मुझे उनके द्वार से यह टका सा जवाब देकर टाल दिया गया कि प्रोफ़ेसर की तबीयत कुछ ठीक नहीं है और वे सभी मुलाकातों से परहेज कर रहे हैं. मुझसे मेरा संपर्क सूत्र छोड़ने के लिये कह दिया गया था और साथ में यह भी कि जब भी प्रोफ़ेसर चाहेंगे, वे मुझसे मुलाकात करेंगे. एक मीडिया कर्मी इतनी आसानी से हार नहीं मानता और मैंने भी प्रयास में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी लेकिन बात बन ना सकी और आखिरकार मन मसोसकर मुझे केवल अपना विज़िटिंग कार्ड छोड़ कर चले आना पड़ा था. न जाने क्यों मुझे अपने प्रिय लेखक ली फ़ॉक का ये डायलॉग बार-बार याद आया था कि आप वेताल को नहीं ढूंढते, वह आपको ढूंढ लेता है. लेकिन प्रोफ़ेसर शास्त्री कोई वेताल जैसा मनगढ़ंत कॉमिक चरित्र तो नहीं हैं. हालांकि उनके इर्द-गिर्द रहस्यों का कुहासा कुछ वैसा ही छाया है जैसा कि वेताल के साथ. इस सीमा से आगे दोनों में समानता समाप्त हो जाती है.

इस घटना को हुए कोई छ्ह-सात माह गुजर गये. प्रारम्भ में कुछ समय मैंने इस आशा को मन में बनाये रखा कि शायद प्रोफ़ेसर के यहां से बुलावा आ ही जाये. लेकिन हर गुजरते दिन के साथ उम्मीद की किरणें निराशा के धुंधलके में खोती चली गयीं और फ़िर धीरे-धीरे मैं इस घटना को बिल्कुल ही भूल कर रोजमर्रा के कार्यों की भागदौड़ में व्यस्त हो गया. इस बीच चैनल ने काफ़ी विस्तार किया और हमें अपनी टीम के सद्स्यों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ानी पड़ी. काम का बोझ बढ़ता गया और मैंने भी प्रोफ़ेसर से मिलने के खयाल को पूरी तरह दिमाग से निकाल दिया.

लेकिन आज अचानक पोस्ट से उनका निमंत्रण पाकर काफ़ी सारी दबी हुई इच्छाएँ एक बार फ़िर दिल के किसी कोने से निकलकर सामने उपस्थित हो गयीं. मैं बेहद उत्साहित था. कितनी ही सारी बातें तो हैं जो उनसे पूछनी हैं, कितने ही सारे सवाल एक श्रंखलाबद्ध तरीके से मेरे मस्तिष्क में चक्कर काटने लगे. लेकिन आमंत्रण-पत्र में साफ़ कहा गया था कि मैं कोई कैमरा या रिकॉर्डिंग का सामान अपने साथ नहीं ले जा सकता था. मतलब स्पष्ट था कि प्रोफ़ेसर चाहते थे कि उनसे मेरी मुलाकात प्रोफ़ेशनल ना होकर सिर्फ़ व्यक्तिगत ही रहे. "समथिंग इज़ बैटर दैन नथिंग", मैंने मन ही मन सोचा, कुछ नहीं से कुछ भला. चैनल का न सही, अपना ही स्वार्थ कुछ सध जाए तो क्या बुरा है? प्रोफ़ेसर शास्त्री जैसी बड़ी हस्तियों से निजी मुलाकात का अवसर भी आखिर कितनों को मिलता है?

रविवार में सिर्फ़ चार दिन बाकी थे मगर तब तक की प्रतीक्षा भी कठिन प्रतीत हो रही थी. सापेक्षिकता के सिद्धांत का पालन करता हुआ समय मंथर गति से चलता रहा और अंतत: बहुप्रतीक्षित दिन आ ही पहुंचा. मेरे अपार्टमेंट से प्रोफ़ेसर के घर की दूरी मुश्किल से दस मिनिट की है पर समय की पाबंदी के सम्बन्ध में आमंत्रण-पत्र की चेतावनी को पूरी श्रद्धा से याद करते हुए मैं नियत समय से आधा घंटा पहले ही अपनी कार निकालकर धड़कता दिल और अनिर्वचनीय उत्सुकता साथ लिये बी-१६, बो-स्ट्रीट की ओर रवाना हो गया.
(जारी है) 

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अगली कड़ी:
एपिसोड नं. ०४: "प्रोफ़ेसर शास्त्री"
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Friday, August 7, 2009

प्रोफ़ेसर का रहस्य (कहानी), एपिसोड ०२: "बो-स्ट्रीट"

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पिछली कड़ी:
एपिसोड नं. ०१: "आमंत्रण-पत्र"
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 (अब आगे)

मॉरिसटाउन, बंगाला के पश्चिमी तट पर बसा हुआ आधुनिक शहर, गगनचुम्बी इमारतों और सभी आधुनिक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण और जो हरेक लिहाज से दुनिया के किसी भी बड़े शहर का मुकाबला करने में सक्षम है. यहां बसता है एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज जो अपने प्रिय राष्ट्रपति डॉ. लुआगा की देख-रेख में तेजी से उन्नति के पथ पर अग्रसर है.

बो-स्ट्रीट, मॉरिसटाउन का एक प्रसिद्ध इलाका है जहां शहर की कई नामी-गिरामी हस्तियां निवास करती हैं. बो-स्ट्रीट दरअसल एक चौड़ी सी सड़क है जो काफ़ी लम्बाई तक सीधी चलती जाती है और फ़िर कुछ इस प्रकार से दो बार घूमती हुई वापस आकर मिलती है कि एक धनुष की सी आकृति बनती है. इसीलिये ये नाम. सड़क के बीच में घिरे हुए दोनों हिस्सों में दो बड़े और खूबसूरत पार्क्स हैं जो पूरी तरह हरी घास की चादर से ढंके रहते हैं. करीने से कटी हुई झाड़ियों और टहलने के लिये तैयार किये गये ग्रेवल के साथ किस्म-किस्म के रंग-बिरंगे फ़ूलों के पौधे जहां पार्क्स को हसीन और दिलकश रंगत प्रदान करते हैं वहीं कई तरह की सुगंध भी हवा में बिखरी रहती हैं और जो यहां आने वाले सैलानियों का मन मोहती रहती हैं. पार्क्स के ऊंचे पेड़ आसमान की ऊंचाई नापने की जद्दोजहद में व्यस्त प्रतीत होते हैं.

सुबह-शाम बच्चों की कई टोलियाँ यहां धमा-चौकड़ी मचाती रहती हैं. दिन के समय बच्चे कम नजर आते हैं और शोर-शराबा भी कम ही होता है. दरअसल ये समय होता है जब कई प्रेमी जोड़े यहां वहां बैठे नजर आते हैं. अपनी रोमांटिक दुनिया में डूबे ये लोग अन्य सैलानियों से बिल्कुल अनजान प्रतीत होते हैं या कहिये कि उनकी वहां उपस्थिति से पूरी तरह लापरवाह. प्रेम से गुटरगूं करते इन जोड़ों के लिये ये पार्क्स आदर्श स्थल कहे जा सकते हैं. समुद्र तट यहां से काफ़ी नज़दीक है और गर्मियों के दिनों में जब शीतल पवन समुद्र से तट की ओर चलती हैं तो पार्क में सैलानियों की संख्या में और बढ़ोतरी हो जाती है. देर रात तक यहां लोगों की भीड़ देखी जा सकती है.

सड़क के एक ओर विशालकाय भवन निर्मित हैं जिनकी बनावट और आकार यहां के निवासियों की समृद्धि की दास्तां आप बयान करते हैं. मकानों के आगे के हिस्से में छोटे-छोटे बगीचे हैं जहां मकान स्वामियों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार पौधे, फ़ल, सब्जी आदि लगा रखे हैं. किसी-किसी घर के बाहर झूले आदि भी देखे जा सकते हैं. कुल मिलाकर बो-स्ट्रीट एक ऐसी जगह है जो किसी के लिये भी रिहाइशी तौर पर एक आकर्षण का बिन्दु हो सकती है.

प्रोफ़ेसर शास्त्री का घर सीधी वाली सड़क के लगभग मध्य में स्थित है. मेरा प्रोफ़ेसर से कभी व्यक्तिगत तौर पर मिलना नहीं हुआ लेकिन वे इतनी प्रसिद्ध हस्ती हैं और उनके बारे में समाचार-पत्रों में इतना कुछ छ्पता रहता है कि मुझे वे कभी भी अपरिचित इंसान नहीं लगे. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बराबर उनके बारे में समाचार देता रहता है. मेरा अपना चैनल, मिस्ट्री चैनल, भी उनके बारे में अक्सर कोई न कोई रिपोर्ट देता ही रहता है. प्रोफ़ेसर शास्त्री मॉलेक्यूलर बायोलॉजी के क्षेत्र में दुनिया भर में पहचाने जाते हैं. नोबल पुरस्कार के लिये भी नामित हो चुके हैं. बंगाला के लिये तो वे गर्व का विषय हैं ही. लेकिन वास्तव में उनके जिस रूप को लेकर मुझे मिलने की उत्कंठा थी वह यह है कि प्रोफ़ेसर के बारे में कई तरह की अजीब बातें भी दबी ज़बान से की जाती हैं. जैसे कि वे किसी अत्यंत गोपनीय प्रयोग में संलग्न रहे हैं, या शायद अब भी हैं. उनके संबंध कुछ अजीब सी जंगली जातियों से हैं और वे अक्सर गायब होकर जंगल में चले जाते हैं. कभी-कभी उनके निवास के आस-पास कुछ अजीब सी वेशभूषा में जंगली लोग देखे जाने का भी दावा किया जाता रहा है पर इन बातों की कभी पुष्टि नहीं हो सकी और ये सब बातें महज अफ़वाहों का दर्जा पाकर ही रह गयीं.
(अभी जारी है) 

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अगली कड़ी:
एपिसोड नं. ०३: "रवानगी"
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Thursday, August 6, 2009

प्रोफ़ेसर का रहस्य (कहानी), एपिसोड ०१: "आमंत्रण-पत्र"

हो सकता है कि आपकी स्मृति मुझसे अधिक तीक्ष्ण हो और आप ठीक-ठीक याद कर सकते हों कि आपने अंतिम बार कलम और कागज का इस्तेमाल कर अपने हाथों से कोई पत्र कब और किसे लिखा था. लेकिन मेरे स्मृति-कोष में ऐसे किसी पत्र के कोई चिह्न नहीं मिलते, कब के साफ़ हो चुके. अपना स्वयं का लिखा तो छोड़िये मुझे तो ये भी स्मरण नहीं कि अंतिम बार कोई हस्तलिखित पत्र मैंने प्राप्त कब किया था. स्थिति तो यहां तक पहुंच गयी है कि अगर वार्षिक ग्राहकी वाली पत्रिकाएँ देने उसे ना आना पड़ता और इस बहाने कभी-कभार उससे मुलाकात ना होती रहती तो मैं सरकारी पोस्टमैन की शक्ल तक कब की भूल चुका होता. आखिर ई-मेल और एस-एम-एस के इस जमाने में स्नेल-मेल को अब पूछता ही कौन है? तो ऐसे में इस बार जब पोस्टमैन ने रीडर्स डाइजेस्ट के नये अंक के साथ एक लिफ़ाफ़ा भी सौंपा जिस पर हाथों से मेरा नाम-पता लिखा हुआ था तो मुझे थोड़ा अचरज होना स्वाभाविक ही था. लेकिन मेरा आश्चर्य उस समय कई गुना बढ़ गया जब मैंने पत्र भेजने वाले का नाम पढ़ा. सुस्पष्ट अक्षरों में सुन्दर लिखावट में साफ़-साफ़ लिखा था - प्रेषक: प्रोफ़ेसर सुधान्शू ए. शास्त्री.

मेरे दिल की धड़कन काफ़ी बढ़ चुकी थी और मैंने बिना कोई समय गंवाए लिफ़ाफ़ा खोलकर तत्क्षण पढ़ना शुरु किया. लिखा था:

प्रिय श्रीमान वेताल शिखर*,

हमें आपको सूचित करते हुए प्रसन्नता है कि प्रोफ़ेसर शास्त्री ने आपके अनुरोध को स्वीकार करते हुए आपसे मुलाकात के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है. आप अगले रविवार २६ जुलाई, २००९ को दिन में १:०० बजे उनके निवास स्थल पर दोपहर भोज के लिये आमंत्रित किये जाते हैं. तत्पश्चात आप प्रोफ़ेसर से निजी बातचीत की सुविधा का भी लाभ उठा सकते हैं.

लेकिन आपको यह स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है कि आप अपने साथ किसी भी किस्म की कोई रिकॉर्डिंग डिवाइस नहीं ला सकते. प्रोफ़ेसर के साथ आपकी बातचीत नितांत व्यक्तिगत रहेगी और इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाएगा. आप इस बातचीत के किसी भी अंश को अपने किसी व्यवसायिक प्रयोग में नहीं ला सकेंगे.

कृपया ध्यान रहे कि प्रोफ़ेसर से मिलने आने वाले सभी आगंतुकों की अच्छी तरह से तलाशी ली जाती है. समय का विशेष ख्याल रखने की हिदायत दी जाती है.


ज़हीन खान
व्यक्तिगत सहायक, प्रोफ़ेसर सुधान्शु ए. शास्त्री
बी- १६, बो-स्ट्रीट, मॉरिसटाउन, बंगाला

एक निमंत्रण पत्र से ऐसी कठोर भाषा की अपेक्षा आप आम तौर पर नहीं रखते. मगर ये कोई आम मामला भी तो नहीं था. इस उम्रदराज़ और उच्च कोटि के विद्वान प्रोफ़ेसर से मिलने की अनुमति पा लेना ही दरअसल अपने आप में एक बड़ी कामयाबी थी. वैसे भी इस तरह के झक्की जीनियस लोग अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहते हैं और समाज के केंद्र से काफ़ी अलग-थलग रहते हैं. उम्र के साथ भी व्यक्ति के स्वभाव में थोड़ा रूखा-सूखा और चिड़चिड़ापन आ ही जाता है. तो मैने पत्र की भाषा को नज़र अंदाज किया और अगले रविवार की तैयारी में जुट गया.

सबसे पहले अपने पी-डी-ए (पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट) में अगले रविवार के दिन की एन्ट्री तलाश की. मधु के साथ उसकी पसंद के किसी रेस्टॉरेंट में लंच का कार्यक्रम था जो काफ़ी समय तक टलने के बाद आखिरकार आने वाले रविवार के दिन के लिये तय किया गया था. मधु को प्रोग्राम टालने की वजह समझाने में कोई खास दिक्कत नहीं आयेगी, ऐसा मेरा सोचना था, और प्रोफ़ेसर शास्त्री के नाम से ही वो स्थिति की गंभीरता का आंकलन कर लेगी. मधु समझदार लड़की है. सिर्फ़ दो वर्षों में जूनियर प्रेसेंटर के पद से तरक्की करते हुए सीनियर एडिटर के पद तक पहुंच गई है. और यकीन मानिये कि इसमें उसकी अपनी लगन और कार्य-द्क्षता के अलावा और कोई वजह नहीं है. इस प्रगति के दौरान उसने जिन तथाकथित बड़े लोगों को पीछे छोड़ा है उनमें से कुछ उसकी इस ताबड़तोड़ तरक्की की वजह उसकी विलक्षण सुन्दरता में ढूंढने का भोंडा और भद्दा प्रयास करते हैं, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, उसकी कार्य-कुशलता हमेशा उसे इन सभी महारथियों से चार कदम आगे रखती है. मैं उसे समझा लूंगा, मुझे पक्का यकीन था.

मैंने पी-डी-ए में पुरानी एन्ट्री को नयी से रिप्लेस किया: मोस्ट अर्जेंट, रविवार, २६ जुलाई, २००९, दोपहर १:००, टु मीट प्रोफ़ेसर शास्त्री एट हिज़ रेज़ीडेंस. सेव करके मैंने यंत्र को टेबिल पर रखा और अन्य कार्यों में संलग्न हो गया.
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* असली नाम बदल दिया गया है.

(अभी जारी है) 

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अगली कड़ी:
एपिसोड नं. ०२: "बो-स्ट्रीट"
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