दोनों किशोरवय बालक किसी गहन विचार-विमर्श में डूबे हुए थे. बातचीत आम तौर पर उत्साहपूर्ण थी पर कभी-कभी उनमें से एक के चेहरे पर कुछ उलझन के से भाव उभर आते थे. दूसरा कुछ ज्यादा जानकार मालूम होता था क्योंकि बार-बार अपनी कलाइयों को हवा में नचाते हुए और चेहरे पर यथासंभव गंभीरता के भावों का आयात करते हुए मित्र को कुछ समझाने की कोशिश करने लगता था. कुछ देर के लिए पहले बालक की आंखों में हल्की सी चमक के दर्शन होते जो कुछ क्षण बाद स्वतः ही लोप हो जाती. सिलसिला काफी देर से चल रहा था.
मैंने थोड़ा ध्यान लगाने की कोशिश की. सोनी, माइक्रोसॉफ्ट, एक्स-बॉक्स, प्ले स्टेशन जैसे कुछ शब्द कानों में पड़े. समझ में आ गया कि ये गंभीर और गहन चर्चा कंप्यूटर गेमिंग को लेकर चल रही है, लेकिन इस क्षेत्र में अधिक रूचि के अभाव के चलते ज्यादातर टेक्नीकल शब्द फ़िर भी सर के ऊपर से निकल रहे थे.
आखिरकार मैंने भी बातचीत में शामिल होने का निर्णय किया. कहा, "अच्छा तो कंप्यूटर गेम्स में रूचि रखते हैं आप लोग." जवाब में दोनों ने मुझे कुछ यूँ देखा जैसे कह रहे हों "ये भी कोई कहने की बात है? कौन नहीं रखता?" कुछ देर विभिन्न गेम्स की बात होती रही. मेरी जानकारी में काफी बढोतरी हुई. लेटेस्ट गेमिंग डिवाइसेस की पूरी श्रंखला का पता चला.
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
लेकिन वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया,
अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला.
"अरे कहाँ अंकल. इतना समय ही कहाँ होता है? और वैसे भी कौन दिमाग खपाए इन बोरिंग किताबों में?"
"लेकिन कुछ हल्का फुल्का तो पढ़ते ही होगे, जैसे कॉमिक्स?"
"नहीं अंकल. हमारे कुछ-एक दोस्त आर्चीस वगैरह पढ़ते हैं, ज्यादा नहीं."
"स्पाइडर मैन, बैट मैन के भी तो कॉमिक्स आते है."
"हाँ, उनकी फिल्में देखी हैं, कॉमिक्स नहीं पढीं."
"लेकिन फ़िल्म तो कॉमिक्स पर ही बेस्ड हैं. कभी पढने की इच्छा नहीं हुई?"
"अब क्या करेंगे पढ़कर? फ़िल्म देख तो ली." आवाज में थोड़ी खीज का भाव आने लगा था. मैंने अन्तिम प्रश्न किया, "और फैंटम को जानते हो?"
दोनों ने एक दूसरे को देखा और हँसे. ये किस चिडिया का नाम है? जाने किस ज़माने की बात कर रहे हैं? "नहीं जानते".
मुझे अपना बचपन याद आया. अगर कोई दोस्त इतना बताने में भी गलती कर देता कि वेताल बदमाशों के जबड़े पर खोपडी का निशान छापने वाली अंगूठी किस हाथ में पहनता है और रक्षक अंगूठी किस हाथ में, तो उसका क्या जबरदस्त मजाक बनता था.
समय बदल गया है. अब कॉमिक्स की जगह टीव्ही, कार्टून चैनल्स और कंप्यूटर ने ले ली है. इस नयी जनरेशन के लिए उस दीवानगी और बेताबी की कल्पना करना भी कठिन है जो वेताल, मैन्ड्रेक जैसे कॉमिक चरित्रों के लिए उन दिनों हुआ करती थी. वैसे हर पीढी अपने हीरो ख़ुद तलाश लेती है या बना लेती है, ये सच्चाई है. लेकिन उन पुराने दिनों को याद करता हूँ तो आज भी एक सुकून सा मिलता है. शायद उम्र वाकई ज्यादा हो गयी है.
इस ब्लॉग पर इंद्रजाल कॉमिक्स के सभी चरित्रों का विस्तार से परिचय उपलब्ध करवाने का प्रयास करूंगा. साथ बने रहिये.
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