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Wednesday, August 20, 2008

इंद्रजाल कॉमिक्स के सभी दीवानों का स्वागत है

मुझे खुशी है कि ये छोटा सा प्रयास आप कई मित्रों की पुरानी मीठी यादों को जगाने में सफल हुआ है. आपकी टिप्पणियां बताती हैं कि दिल के किसी कोने में उन खोये हुए लम्हों की कसक अभी तक बाकी है. सच है बचपन होता ही ऐसा है.

विजय वडनेरे जी ने लिखा है कि उन्हें आज भी कहीं ये कॉमिक्स मिल जाती हैं तो पढ़े बिना नहीं रहा जाता. साथ ही पूछते हैं कि क्या इस ब्लॉग पर कॉमिक्स भी रहेंगी? विजय जी, इंद्रजाल कॉमिक्स को लेकर आज भी एक जूनून की सी स्थिति है. कई संग्रहक पुरानी किताबों से लेकर रद्दी की दुकानों तक पर इनके लिए चक्कर काटते हैं. कोई दो महीने पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस बारे में एक लेख भी प्रकाशित किया था. मेरे एक मित्र बता रहे थे कि किस तरह कोलकाता में उन्होंने किसी खास अंक के लिए दो खरीदारों को झगड़ते हुए देखा. अगर आप e-bay पर देखें तो ये पुरानी कॉमिक्स सौ रुपये से लेकर चार सौ रुपये तक में बिक रही हैं, और वहाँ भी खरीदारों की कमी नहीं है. कुछ दिन पहले शास्त्री जी ने बताया था कि उन्होंने १५० रुपए में फैंटम का एक पुराना अंक खरीदा.

जहाँ तक इस ब्लॉग पर कॉमिक्स पोस्ट करने की बात है तो प्राथमिक तौर पर मेरा इरादा यहाँ कॉमिक्स पोस्ट करने का नहीं है क्योंकि अन्य कई ब्लॉग्स पर पहले ही ये कॉमिक्स मौजूद हैं. (इनमें मेरा अपना अंग्रेजी ब्लॉग भी शामिल है जहाँ मैं पचास से ज्यादा कॉमिक्स पोस्ट कर चुका हूँ.) अगर इन ब्लॉग्स की जानकारी चाहें तो मुझे thephantomhead(at)gmail(dot)com पर ई-मेल कर सकते हैं. वैसे हर अंक के मुख्य पृष्ठ की हाई रेसोल्यूशन पिक्चर यहाँ अवश्य रहेगी.

शिवनागले दमुआ जी ने भी उत्साहवर्द्धक टिप्पणी दी है. नीरज गोस्वामी जी ने तो यादों के समुन्दर में गोते लगाना प्रारम्भ भी कर दिया. इसी तरह के संस्मरण का खजाना हम सभी के पास होगा. आइये मिल बांटे और आनंद लें. दिनेशराय द्विवेदी जी को ब्लॉग के विचार के साथ-साथ उसका ले-आउट भी पसंद आया. उनका हार्दिक धन्यवाद. मसिजीवी जी ने भी चर्चा के साथ कॉमिक्स भी ठेलने को कहा है. मैं फ़िर दोहरा हूँ. मूल विचार यहाँ कॉमिक्स पोस्ट करने का नहीं है, लेकिन अगर आवश्यक लगा और आप मित्रों ने जोर दिया तो कॉमिक्स यहाँ भी अवश्य ठेले जायेंगे. कुश जी अपने खूबसूरत ख्याल के साथ चटाई बिछा कर बैठ गए हैं. उनका स्वागत है.

संजीत त्रिपाठी जी को फैण्टम पर बनी हॉलीवुड फ़िल्म की तलाश है. शायद निम्न जानकारी उनके काम की हो या रोचक लगे:
१. फैण्टम पर अब तक सिर्फ़ एक ऑफिशियल फ़िल्म बनी है, सन् १९९६ में, "द फैण्टम" नाम से. इसमें बिली जेन ने फैण्टम और क्रिस्टी स्वेंसन ने डायना की भूमिका की थी. इनके अलावा केथरीन जेटा जोन्स भी इसमें थीं. इस फ़िल्म की सीडी यहाँ मार्केट में आसानी से उपलब्ध है. अगर आप को रायपुर में इसे ढूँढने में कठिनाई हो रही हो तो मैं इसे आप को यहाँ से भेज दूँगा. वैसे इतना जोड़ना चाहूँगा कि १९९६ में जब ये फ़िल्म रिलीज हुई थी तो मैंने इसे टॉकीज में देखा था और मुझे ये कोई खास पसंद नहीं आयी थी. वास्तव में ली फाक के अलावा कोई भी लेखक वो जादू नहीं जगा सकता. जैसा कि कॉमिक्स में भी देखा गया, विभिन्न देशों में कई लोगों ने फैण्टम के कथानक पर काम किया पर कोई भी उस स्तर के आस-पास भी नहीं पहुँच सका.
२. एक और फ़िल्म की घोषणा २००२ में हुई थी. "द घोस्ट हू वाक्स" नाम से बनने वाली इस फ़िल्म का प्रोजेक्ट कम से कम २००६ तक जीवित था. उसके बाद की जानकारी नहीं है.
३. फैण्टम पर कई टीवी सीरियल बन चुके हैं. १९४३ मैं "द फैण्टम" बना. १९५५ में इसके सिक्वल के कुछ एपिसोड प्रदर्शित किए गए. "फैण्टम २०४०" और "दिफेंडर्स ऑफ़ द अर्थ" नामक सीरियल्स की कहानियाँ भावी फैण्टम पर आधारित हैं.
४. कुछ स्टेज ड्रामास भी इस पात्र को लेकर रचे गए. (स्वीडन और नॉर्वे में)
५. कई वीडियो तथा मोबाईल गेम्स बन चुके हैं.
६. स्वीडन में फैण्टम लोक पर आधारित एक थीम पार्क बना है.
७. फैण्टम पर कई मजेदार पेरोडीस भी बनीं हैं.

कुछ और खट्टी-मीठी यादें तलाश रहे हैं, जीशान जैदी जी. वहीं जोशिम जी तो बाकायदा मैन्ड्रेक के रोल में आ गए हैं और टैलीपैथी से संपर्क साधने की कोशिश में हैं. जी हाँ, मनीष जी. आप बिल्कुल दुरुस्त पहुंचे हैं दुर्गम तिब्बती पठार के रहस्यमय जहान में जो बाकी दुनिया की नजरों से सर्वथा ओझल है. स्वागत है आपका. ई-स्वामी फैंटम को सबसे ऊपर रखते हैं और कहते हैं कि जब तक उसकी कहानियाँ ख़त्म न हो जाएँ, किसी और का नंबर नहीं लगना चाहिए. सही है, फैंटम की लोकप्रियता तो सर्वोपरि है. इंद्रजाल कॉमिक्स के ८०३ प्रकाशित अंकों में से ४०० से भी ज्यादा में केवल अकेले फैंटम की ही कहानियाँ थीं. बाकी करीब १५ अन्य पात्र मिलकर ४०० कॉमिक्स दे पाये. यही सब कुछ कह देता है. लेकिन यहाँ हम बात करने वाले हैं सभी इंद्रजाल कॉमिक्स की उनके प्रकाशन के क्रम में. अगर लगातार फैंटम को ही लेते रहे तो थोड़ी मोनोटोनी नहीं हो जायेगी? वैसे पहली ३२ कॉमिक्स केवल फैंटम की ही हैं. :-)

अनुराग जी ने भी आसन ग्रहण कर लिया है, जी हाँ बस शुरू हुआ समझिये सर जी. अमित सागर जी भी इंद्रजाल मेनिया के शिकार रह चुके हैं. उनका भी स्वागत है.

अगली पोस्ट में हम विस्तार से बात करेंगे वेताल चरित्र के बारे में, इस महागाथा के प्रारम्भ की चर्चा करेंगे और उसकी दुनिया को जानेंगे गहराई से. और इसके लिए आपको ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा. आपकी उम्मीद से जल्दी हाजिर होते हैं.

अगर कुछ आपके भी दिल में आता है तो अवश्य कहिये.


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