Thursday, August 6, 2009

प्रोफ़ेसर का रहस्य (कहानी), एपिसोड ०१: "आमंत्रण-पत्र"

हो सकता है कि आपकी स्मृति मुझसे अधिक तीक्ष्ण हो और आप ठीक-ठीक याद कर सकते हों कि आपने अंतिम बार कलम और कागज का इस्तेमाल कर अपने हाथों से कोई पत्र कब और किसे लिखा था. लेकिन मेरे स्मृति-कोष में ऐसे किसी पत्र के कोई चिह्न नहीं मिलते, कब के साफ़ हो चुके. अपना स्वयं का लिखा तो छोड़िये मुझे तो ये भी स्मरण नहीं कि अंतिम बार कोई हस्तलिखित पत्र मैंने प्राप्त कब किया था. स्थिति तो यहां तक पहुंच गयी है कि अगर वार्षिक ग्राहकी वाली पत्रिकाएँ देने उसे ना आना पड़ता और इस बहाने कभी-कभार उससे मुलाकात ना होती रहती तो मैं सरकारी पोस्टमैन की शक्ल तक कब की भूल चुका होता. आखिर ई-मेल और एस-एम-एस के इस जमाने में स्नेल-मेल को अब पूछता ही कौन है? तो ऐसे में इस बार जब पोस्टमैन ने रीडर्स डाइजेस्ट के नये अंक के साथ एक लिफ़ाफ़ा भी सौंपा जिस पर हाथों से मेरा नाम-पता लिखा हुआ था तो मुझे थोड़ा अचरज होना स्वाभाविक ही था. लेकिन मेरा आश्चर्य उस समय कई गुना बढ़ गया जब मैंने पत्र भेजने वाले का नाम पढ़ा. सुस्पष्ट अक्षरों में सुन्दर लिखावट में साफ़-साफ़ लिखा था - प्रेषक: प्रोफ़ेसर सुधान्शू ए. शास्त्री.

मेरे दिल की धड़कन काफ़ी बढ़ चुकी थी और मैंने बिना कोई समय गंवाए लिफ़ाफ़ा खोलकर तत्क्षण पढ़ना शुरु किया. लिखा था:

प्रिय श्रीमान वेताल शिखर*,

हमें आपको सूचित करते हुए प्रसन्नता है कि प्रोफ़ेसर शास्त्री ने आपके अनुरोध को स्वीकार करते हुए आपसे मुलाकात के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है. आप अगले रविवार २६ जुलाई, २००९ को दिन में १:०० बजे उनके निवास स्थल पर दोपहर भोज के लिये आमंत्रित किये जाते हैं. तत्पश्चात आप प्रोफ़ेसर से निजी बातचीत की सुविधा का भी लाभ उठा सकते हैं.

लेकिन आपको यह स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है कि आप अपने साथ किसी भी किस्म की कोई रिकॉर्डिंग डिवाइस नहीं ला सकते. प्रोफ़ेसर के साथ आपकी बातचीत नितांत व्यक्तिगत रहेगी और इसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाएगा. आप इस बातचीत के किसी भी अंश को अपने किसी व्यवसायिक प्रयोग में नहीं ला सकेंगे.

कृपया ध्यान रहे कि प्रोफ़ेसर से मिलने आने वाले सभी आगंतुकों की अच्छी तरह से तलाशी ली जाती है. समय का विशेष ख्याल रखने की हिदायत दी जाती है.


ज़हीन खान
व्यक्तिगत सहायक, प्रोफ़ेसर सुधान्शु ए. शास्त्री
बी- १६, बो-स्ट्रीट, मॉरिसटाउन, बंगाला

एक निमंत्रण पत्र से ऐसी कठोर भाषा की अपेक्षा आप आम तौर पर नहीं रखते. मगर ये कोई आम मामला भी तो नहीं था. इस उम्रदराज़ और उच्च कोटि के विद्वान प्रोफ़ेसर से मिलने की अनुमति पा लेना ही दरअसल अपने आप में एक बड़ी कामयाबी थी. वैसे भी इस तरह के झक्की जीनियस लोग अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहते हैं और समाज के केंद्र से काफ़ी अलग-थलग रहते हैं. उम्र के साथ भी व्यक्ति के स्वभाव में थोड़ा रूखा-सूखा और चिड़चिड़ापन आ ही जाता है. तो मैने पत्र की भाषा को नज़र अंदाज किया और अगले रविवार की तैयारी में जुट गया.

सबसे पहले अपने पी-डी-ए (पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट) में अगले रविवार के दिन की एन्ट्री तलाश की. मधु के साथ उसकी पसंद के किसी रेस्टॉरेंट में लंच का कार्यक्रम था जो काफ़ी समय तक टलने के बाद आखिरकार आने वाले रविवार के दिन के लिये तय किया गया था. मधु को प्रोग्राम टालने की वजह समझाने में कोई खास दिक्कत नहीं आयेगी, ऐसा मेरा सोचना था, और प्रोफ़ेसर शास्त्री के नाम से ही वो स्थिति की गंभीरता का आंकलन कर लेगी. मधु समझदार लड़की है. सिर्फ़ दो वर्षों में जूनियर प्रेसेंटर के पद से तरक्की करते हुए सीनियर एडिटर के पद तक पहुंच गई है. और यकीन मानिये कि इसमें उसकी अपनी लगन और कार्य-द्क्षता के अलावा और कोई वजह नहीं है. इस प्रगति के दौरान उसने जिन तथाकथित बड़े लोगों को पीछे छोड़ा है उनमें से कुछ उसकी इस ताबड़तोड़ तरक्की की वजह उसकी विलक्षण सुन्दरता में ढूंढने का भोंडा और भद्दा प्रयास करते हैं, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, उसकी कार्य-कुशलता हमेशा उसे इन सभी महारथियों से चार कदम आगे रखती है. मैं उसे समझा लूंगा, मुझे पक्का यकीन था.

मैंने पी-डी-ए में पुरानी एन्ट्री को नयी से रिप्लेस किया: मोस्ट अर्जेंट, रविवार, २६ जुलाई, २००९, दोपहर १:००, टु मीट प्रोफ़ेसर शास्त्री एट हिज़ रेज़ीडेंस. सेव करके मैंने यंत्र को टेबिल पर रखा और अन्य कार्यों में संलग्न हो गया.
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* असली नाम बदल दिया गया है.

(अभी जारी है) 

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अगली कड़ी:
एपिसोड नं. ०२: "बो-स्ट्रीट"
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3 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कहानी का आरंभ बहुत अच्छा है। इंतजार करते हैं आगे के लिए।

shobi said...

bahut accha likha hai. Rahasay kayam hai, aage ke bhag ka intazaar rahega.

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब...