Thursday, August 28, 2008

नयी पीढ़ी नहीं जानती फैंटम और मैन्ड्रेक को

दोनों किशोरवय बालक किसी गहन विचार-विमर्श में डूबे हुए थे. बातचीत आम तौर पर उत्साहपूर्ण थी पर कभी-कभी उनमें से एक के चेहरे पर कुछ उलझन के से भाव उभर आते थे. दूसरा कुछ ज्यादा जानकार मालूम होता था क्योंकि बार-बार अपनी कलाइयों को हवा में नचाते हुए और चेहरे पर यथासंभव गंभीरता के भावों का आयात करते हुए मित्र को कुछ समझाने की कोशिश करने लगता था. कुछ देर के लिए पहले बालक की आंखों में हल्की सी चमक के दर्शन होते जो कुछ क्षण बाद स्वतः ही लोप हो जाती. सिलसिला काफी देर से चल रहा था.

मैंने थोड़ा ध्यान लगाने की कोशिश की. सोनी, माइक्रोसॉफ्ट, एक्स-बॉक्स, प्ले स्टेशन जैसे कुछ शब्द कानों में पड़े. समझ में आ गया कि ये गंभीर और गहन चर्चा कंप्यूटर गेमिंग को लेकर चल रही है, लेकिन इस क्षेत्र में अधिक रूचि के अभाव के चलते ज्यादातर टेक्नीकल शब्द फ़िर भी सर के ऊपर से निकल रहे थे.

आखिरकार मैंने भी बातचीत में शामिल होने का निर्णय किया. कहा, "अच्छा तो कंप्यूटर गेम्स में रूचि रखते हैं आप लोग." जवाब में दोनों ने मुझे कुछ यूँ देखा जैसे कह रहे हों "ये भी कोई कहने की बात है? कौन नहीं रखता?" कुछ देर विभिन्न गेम्स की बात होती रही. मेरी जानकारी में काफी बढोतरी हुई. लेटेस्ट गेमिंग डिवाइसेस की पूरी श्रंखला का पता चला.

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
लेकिन वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया,
अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला.
फ़िर धीरे से मैंने बातचीत का रुख अपनी रूचि की ओर मोड़ने की कोशिश की. पूछा, "और कुछ पढने का भी शौक है आप लोगों को?" और फ़िर जल्दी से जोड़ा, "मतलब कुछ स्टोरीस वगैरह, अदर देन एकेडमिक्स."

"अरे कहाँ अंकल. इतना समय ही कहाँ होता है? और वैसे भी कौन दिमाग खपाए इन बोरिंग किताबों में?"

"लेकिन कुछ हल्का फुल्का तो पढ़ते ही होगे, जैसे कॉमिक्स?"

"नहीं अंकल. हमारे कुछ-एक दोस्त आर्चीस वगैरह पढ़ते हैं, ज्यादा नहीं."

"स्पाइडर मैन, बैट मैन के भी तो कॉमिक्स आते है."

"हाँ, उनकी फिल्में देखी हैं, कॉमिक्स नहीं पढीं."

"लेकिन फ़िल्म तो कॉमिक्स पर ही बेस्ड हैं. कभी पढने की इच्छा नहीं हुई?"

"अब क्या करेंगे पढ़कर? फ़िल्म देख तो ली." आवाज में थोड़ी खीज का भाव आने लगा था. मैंने अन्तिम प्रश्न किया, "और फैंटम को जानते हो?"

दोनों ने एक दूसरे को देखा और हँसे. ये किस चिडिया का नाम है? जाने किस ज़माने की बात कर रहे हैं? "नहीं जानते".

मुझे अपना बचपन याद आया. अगर कोई दोस्त इतना बताने में भी गलती कर देता कि वेताल बदमाशों के जबड़े पर खोपडी का निशान छापने वाली अंगूठी किस हाथ में पहनता है और रक्षक अंगूठी किस हाथ में, तो उसका क्या जबरदस्त मजाक बनता था.

समय बदल गया है. अब कॉमिक्स की जगह टीव्ही, कार्टून चैनल्स और कंप्यूटर ने ले ली है. इस नयी जनरेशन के लिए उस दीवानगी और बेताबी की कल्पना करना भी कठिन है जो वेताल, मैन्ड्रेक जैसे कॉमिक चरित्रों के लिए उन दिनों हुआ करती थी. वैसे हर पीढी अपने हीरो ख़ुद तलाश लेती है या बना लेती है, ये सच्चाई है. लेकिन उन पुराने दिनों को याद करता हूँ तो आज भी एक सुकून सा मिलता है. शायद उम्र वाकई ज्यादा हो गयी है.

इस ब्लॉग पर इंद्रजाल कॉमिक्स के सभी चरित्रों का विस्तार से परिचय उपलब्ध करवाने का प्रयास करूंगा. साथ बने रहिये.

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17 टिप्पणियां:

Pratyaksha said...

रानी समारिस वाली कहानी और गश्ती दल कैसे बना ..वो पढ़वाईये

dArA said...

VERY WELL WRITTEN!! A very-frequent-incident one can experince throught d India!
This post echoed my feelings,allthough here in Kolkata condition is bit better as Phantom(OR Arayandev) & Mandrake are still appearing in ONE MOST Selling Newspaper & in another Mangazine where current Phantom Sundays r regularly publish! So youngstars r at least aware of these P/M characters BUT THAT'S IT!!! Abt others like Flash/Kirby/Bahdur etc they don have an iota knowledge!!
I can say my own experince....as I was/is a true comics-buff & collected a huge bunch,my 10-year younget brother,17 now,had d test of these apparently LOST gems frm his childhood.As a result,he's also a crazy fan of Ijc/ACK/Tintin etc etc but whenever I asked him abt HIS friends,he always says - allthough P/M r not alien to 'em,MOST OF THEM never heard "Indrajal Comics"!CAN YOU IMAGINE IT???
WE,those '80s born,were very late-entry in Ijc-club but had a tremedous fascination towads this ACTION SERIES,besides those Pran's Fun-series like Chacha/Pinki etc,,so I understnd d depth of 'em introduced in late '60s & '70s,,
I still remember how much CRAZY we became whenever a NEW Indrajal released or got a few old Ijcs frm some elder's collections!!
THOSE WERE DAYS,,,WILL NEVER FORGET RATHER CHERISH THOSE MOMENTS FOR EVER!!!! :-)
And like you said,here also youngstrs crazy for Video-game/CN etc but hardly read any comics,,,a REAL sad thing! :(

dArA said...

And may I ask,which one was your first Indrajal or so??
Mine was '89s Rip Kirby/Phantom etc & bought my FIRST Ijc : Mystery of the Black-box(V26 N33)

Amit Pachauri (अमित पचौरी) said...

"अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
लेकिन वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया,
अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला."

... बच्चन के ये शब्द बिल्कुल उपयुक्त हैं।

अब न रहे वे कॉमिक्स के दीवाने ।
अब न रही कॉमिक्स के विलुप्त स्वप्नलोक के दीवानों की मधुशाला । पर हमारी पीढी के दीवानों में अब भी वो मस्ती की यादें ताज़ा हैं । और आज भी हम इन ई-बुक्स कॉमिक्स को डाउनलोड कर पढने से अपने आप को नहीं रोक पाते ।

अनुराग said...

सही कहा ....आपने तभी तो एस्ट्रिक्स की कोमिक्स हमने भी संभाल कर रखी है .अफ़सोस है इंद्रजाल नही रख पाये

Comic World said...

आज ये देख कर सच मे बड़ा दुःख होता है के पढने की आदत न जाने कहा गुम हो गई हैं.एक ज़माना था जब कीताबें मनोरंजन का एकमात्र साधन थी ...Sorry i tried to write in Hindi using transliteration but my browser(Firefox and Opera)does not support total Devnagri fonts,hence i can't type words in proper and correct Hindi and also Hindi typing was taking lot of time therefore reverted back to English typing...anyway let me complete the remaining comment..!
Its sad that todays generation is not much enthusiastic about comics/books but in our childhood reading comics and watching movies in theater was the only pastime,though at later stage T.V./VCR was also introduced.
Since getting opportunity to watch movies was not easily available hence reading comics was the only option left,and i was such a book freak that i use to read books/comics in almost all my free time,even while taking lunch/dinner my right hand use to carry morsels to mouth and left hand use to turn pages of comic/novel...such a book addict i was.
Even now friends/relatives inquires after seeing my almirah full of comics that if i still use to read them!!

वेताल शिखर said...

@प्रत्यक्षा जी:जैसा आप कहें. अगली पोस्ट देखिये.

वेताल शिखर said...

@dara: Thanks.

After Falk, the standard of phantom stories has deteriotated sharply, as we've discussed earlier. No surprise then if the new lads don't find these stories catching enough.

Most of the newspapers have stopped publishing P/M here and the newbies are not familiar even with the concept/background of the characters.

I think you were just lucky (like many of us) to witness the first hand experience of Indrajal Comics, though very late in passing phase of eightees. You'll agree that (for a true comics lover) there in no other experience to parallel the excitement of seeing a new indrajal comics at book shop. The waiting for the new issue was as sweet as it can get.

Congratulations to you for germinating the seeds of comic loving in your brother (I didn't know he is just 17).

I can't precisely pin-point any single issue of indrajal as the first I read, 'cause that was a long way back and I was just 7-8 years old. But I do remember reading the stories of IJC 252, IJC 334 and the special issue in which phantom gets married to Diana. Turning the pages of those brand new issues was something I can't explain in words now.

Thanks for sharing views.

वेताल शिखर said...

@ अमित पचौरी जी: आपका स्वागत है. ये ब्लॉग सभी इंद्रजाल कॉमिक्स प्रेमियों को आपस में जुड़ने का अवसर दे सकेगा, ऐसी आशा है. आपको भी पुरानी यादें ताजा करने का अवसर मिला, जानकर बेहद खुशी हुई. डिजीटल कॉमिक्स भी किसी हद तक उस कमी को पूरा करते हैं, पढ़ते रहिये.

वेताल शिखर said...

@ अनुराग जी: एस्ट्रिक्स के भी कमाल के कॉमिक्स हैं और आपका कॉमिक्स के प्रति अनुराग प्रशंसनीय है. आपको यहाँ देखकर हमेशा प्रसन्नता होती है.

dArA said...

Yes,current Phantom strips r really bad,allthough Mandrake,under Fredricks,still manages to deliver some degree of excitement!
And wow! I very much agree wid the fact of "1st-hand experince" as I'd also same feelings even though for a short while(~1 year or so)!! But saying this,I shud mention that,as I(& my most frnds) were crazy for these Amazing thrillers,so old or new,but ANY UN-READ Indrajal(s) was like a "NEW" release - so much hooked we were!!!
Those were d days - ONLY FOR IJC I will never forget tht period of my life! :-)
And yes,my bro is among those rare teens who's as much fascinated abt these P/M or Ijcs as WE are,,,,one small example like,as you may know in India Newspaper publish P/M 8-9 Months LATE than Original US release,like today's strip is from 5th Dec,2007 and I read frm direct On-Line means while my bro prefer Newspapers! So everyday,amidst his busy study-schedule, he manages to read those couple of P/M strips frm our dailes,and NEVER missed a single strip!!:-)
I guess this explain his fascination as his MOST Friends can't even imagine 2 do this(as they donno what IJC really WAS!!!)

And again thanks for this post.
Cheers!

वेताल शिखर said...

@ CW: Comics are still being published world over but modern trend is to emphasize more on mindless violence with story part taking a back seat. Real absurd stuff mostly. The good old days will always be remembered with passion and love.

संजय बेंगाणी said...

अपने अपने समय की पसन्द है.

Anonymous said...

भगवान कसम आप ने बचपन के सुनहरे दिन याद दिला दिये.

मैं अपनी श्रीमती जी को काफी इन्‍द्रजाल कामिक्‍सें पढा चुका हूँ पर एक नहीं मिल रही । मैन्‍ड्रेक की है नाम याद नहीं आ रहा पर जिसमें उसके स्‍कूल और एक बूढे हेडमास्‍टर व एक स्‍फटिक का जिक्र है मैं समझता हूँ कि हैरी पॉटर का कौन्‍सेप्‍ट उसी से लिया गया है उसमें भी एक मास्‍टर था जो दुष्‍ट था स्‍नेप की तरह । अगर वो आपको मिले तो पोस्‍ट करियेगा । मेरे पास भी काफी कामिक्‍सों का कलेक्‍शन है स्‍कैन की हुयी हैं आपको चाहिये तो बताइयेगा ।


editor@khulasatv.com

वेताल शिखर said...

@ संजय जी: सच है, जब हम लोग कॉमिक्स पढ़ते थे तो इसे पिछली पीढी कौन सी बड़ी इज्जत से देखती थी? शायद समय की मांग यही है.

वेताल शिखर said...

@ अनोनिमस जी खुलासा टीवी से: बढ़िया है जी. वैसे मैंने भी अपनी श्रीमती जी को इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ने की कोशिश की मगर उन्होंने ज्यादा रूचि नहीं दिखाई.

आप जिस कहानी का जिक्र कर रहे हैं वो दरअसल मैन्ड्रेक के चरित्र चित्रण का एक विशेष भाग है. जिस दुष्ट प्रोफेसर की बात आपने कही वो मैन्ड्रेक का सौतेला भाई लूसिफर (विषधर) है. विषधर उस जादुई घन के पीछे पड़ा है जो उसके (और मैन्ड्रेक के भी) पिता थेरौन ने मैन्ड्रेक को सौंपा है. अनेक कहानियो में मैन्ड्रेक की विषधर से मुठभेड़ होती है. हम आगे चर्चा करेंगे.

अगर आपके पास इंद्रजाल कॉमिक्स के स्केन्स हैं तो आप उन्हें हम सभी के साथ शेयर कर सकते हैं. आप मुझे thephantomhead@gmail.com पर मेल करके ये स्केन्स भेज सकते हैं. उन्हें मैं यहाँ पोस्ट कर दूँगा.

बहुत बहुत धन्यवाद.

vikram said...

Hi,

What about those who were part of this transition period? I love my comics and video games ;)

Anyway, I was born in 82 and never abandoned one for the other. I have had almost all gaming consoles and bucketful of comics.

Keep up the good work! I have just subscribed your RSS and will wait for your posts everyday.

Regards,
Vikram