Thursday, January 15, 2009

इंद्रजाल कॉमिक्स अंक-००२ "अन्यायी की सेना" (अप्रैल १९६४)

ली फ़ॉक ने वेताल के लिये एक बेहद रहस्यमय लोक की कल्पना की. जंगल की अनेक किंवदंतियाँ उसके इर्द-गिर्द रची गयी. इस चरित्र की लोकप्रियता में इन रोमाँचक जनश्रुतियों का बड़ा योगदान रहा है जो वेताल की कहानियों को अन्य शहरी पात्रों से अलग बनाती हैं. पात्र को एक वृहद आकार देने में बड़ी कमाल की बाजीगरी दिखाई गयी है और इसका असर तुरन्त होता है जब पाठक अपने आप को कथानक से बंधा हुआ महसूस करता है.


इन्द्रजाल का दूसरा अंक एक ऐसी ही कहानी लेकर आया. आइये आनन्द उठायें.



इन्द्रजाल कॉमिक्स अंक-२ "अन्यायी की सेना" (अप्रैल १९६४)

वेताल प्रदेश में मीलों तक फ़ैले घने जंगल के पूर्वी किनारे पर धुंध में डूबे रहने वाले ऊंचे पठारी इलाके (misty mountains) हैं जिनमें अभी भी मध्ययुगीन मानसिक संरचनाओं में जीने वाले राजा शासन करते हैं. ऊंचे पहाड़ों पर बने किलों में आधुनिक सुविधाओं से युक्त अपने महलों में इन बिगड़े नवाबों ने अपने आमोद-प्रमोद के सभी साधन जुटा रखे हैं.

इन अय्याश राजाओं और शहजादों में शहजादे ओर्क का स्थान सबसे ऊपर है. राजशाही से प्राप्त सत्ता के मद में चूर इस क्रूर, निर्दयी और परम स्वार्थी शहजादे ओर्क के मनोरंजन का एक मुख्य साधन है नजदीकी जंगल में जानवरों का आखेट करना. एक दिन ओर्क अपने सैनिकों के साथ अपने प्रिय शगल पर निकला होता है. जंगल में एक हिरण पर निशाना साधते  ओर्क के रास्ते में अचानक किसी नजदीकी कबीले का एक बालक यह कहकर आ जाता है कि  यह उसका पालतू हिरण है जिसे उसने बचपन से पाला है. शिकार में व्यवधान पड़ता देखकर ओर्क आगबबूला होकर अपने सैनिकों को उस बच्चे को बेंत से पीटने का आदेश देता है. किस्मत से वेताल उस स्थान के नजदीक ही होता है और वह उस बालक को ओर्क के चंगुल से मुक्त करवा देता है.

यह सब देखकर ओर्क का गुस्सा सातवें आसमान पर है और वह अपने सैनिकों से वेताल को पकड़ने को कहता है मगर सैनिक वेताल के बारे में जानते हैं और उसके आदेश की अवहेलना करते हुए शहजादे को वहाँ से निकल लेने की राय देते हैं. क्रोध में भरकर ओर्क स्वयं वेताल पर अपने हंटर से प्रहार करने का प्रयास करता है और जैसा कि होना ही था, बुरी तरह अपमानित होकर वहाँ से निकलने पर बाध्य होता है.
ओर्क वापिस अपने महल लौट आया है लेकिन जंगल में अपने सैनिकों के सामने एक नकाबपोश के हाथों हुए अपने अपमान को याद करके बुरी तरह तिलमिलाया हुआ है. किसी भी कीमत पर वेताल से बदला लेने पर आमादा ओर्क अपने सलाहकार से मशवरा कर राज्य के तीन खूंख्वार बदमाशों को इकठ्ठा करता है. ये तीनों छंटे हुए बदमाश हैं और पैसे के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार हैं. इनमें शामिल हैं खतरनाक हत्यारा स्पाइक जो चाकू और बंदूक चलाने में उस्ताद है, ऊंची कद-काठी का बदमाश टिनी जो स्वयं अपने हाथों से ही किसी को भी मार सकता है, और तीसरा एक गाइड है जो जंगल की भली-भांति जानकारी रखता है. अपने विगत अपराधों की सजा-मुक्ति और बड़े इनाम के लालच में ये जंगल जाकर वेताल को पकड़ने के लिये तैयार हो जाते हैं.

तीनों हत्यारे घोड़ों पर सवार होकर जंगल पहुंचते हैं. मगर जंगल में वेताल से सम्बन्धित इतने सारे मिथक उनका इंतजार कर रहे हैं कि वे चकराकर रह जाते हैं. वेताल की तलाश में पूरे जंगल की खाक छानते फ़िर रहे तीनों बदमाशों को जंगल वासियों से पता चलता है कि वेताल गोरिल्ले को अपने हाथों से धराशायी कर देता है, शेरों को केवल एक भाले से खत्म कर सकता है, और कुछ कहते हैं कि वह बड़े-बड़े पेड़ों को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकता है. एक कबीले वाला बताता है कि वेताल का निशाना इतना सटीक है कि वह जंगली सूअर के कान पर बैठी मक्खी को पिस्तौल से उड़ा सकता है, ऐसे कि सूअर को जरा भी चोट ना पहुचे.

तीनों भयभीत हो उठते हैं. और आगे बढ़ने पर एक अन्य अजीब बात सुनने को मिलती है. वेताल का रहस्यलोक और भी विस्मयकारी होकर उभरता है जब जंगलवासी बताते हैं कि वेताल एक साथ कई स्थानों पर देखा जा सकता है. इसी प्रकार की असम्भव बातों की श्रंखला में यह भी सुनने को मिलता है कि वेताल के घोड़े तूफ़ान के पंख हैं और वह उसपर उड़ान भरता है. पूरा जंगल वेताल के प्रति अनेक अंधविश्वासपूर्ण बातों से भरा पड़ा है.

आखिर वेताल रहता कहाँ है? जवाब मिलता है कि बीहड़बन में लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी कि वहाँ जाना अपनी जान गंवाना है, क्योंकि पिग्मी बांडार बौने अपने अत्यन्त खतरनाक जहर बुझे तीरों के साथ घुसपैठियों का स्वागत करते हैं. इस जगह जाते तो बाकी जंगलवाले भी डरते हैं. यही होता है जब वे बीहड़बन के नजदीक पहूंचते हैं. बांडार उन्हें रोक लेते हैं और वेताल के कहने पर वहीं रुकने का आदेश देते हैं. बीहड़बन की सीमा पर डेरा डाले तीनों बदमाश वेताल के वहां पहूंचकर उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं जब वेताल गुपचुप वहां पहुंचकर उनकी बातें सुनकर असलियत जान लेता है. आखिरकार बदमाशों की इच्छा पूरी होती दिखती है जब वेताल अकेला उनके सामने आता है. लेकिन अंत यह होता है कि तीनों बदमाश रस्सी से बांध कर अपने मालिक शहजादे ओर्क के महल की ओर रवाना कर दिये जाते हैं.
इधर ओर्क बेसब्री से इंतजार में है कि जंगल से कोई अच्छा समाचार आये. जंगल में वेताल के हाथों ओर्क के अपमान की खबर उसके पूरे राज्य में फ़ैल चुकी है और लोग पीठ पीछे उसका उपहास करने लगे हैं. जब ओर्क के तीनों किराये के हत्यारे भी अपने मिशन में असफ़ल रहकर वापिस फ़ेंक दिये जाते हैं तो प्रजा को अपने जिद्दी और सनकी शहजादे पर और भी हंसने का मौका मिल जाता है.



ओर्क की बौखलाहट की अब कोई सीमा नहीं. वह अपनी पूरी सेना को वेताल पर चढ़ाई करने का हुक्म दे देता है. सेना की तीन टुकड़ियों, इन्फ़ैन्ट्री (पैदल सेना), कैवेलरी (घुड़सवार सेना) और आर्टिलरी (तोपखाना) के पचास हजार सैनिक जंगल की ओर कूच करते हैं. जंगल वासी चिंतित हैं. इतनी बड़ी सेना का सामना अकेला वेताल शायद ना कर सके. वे अपनी ओर से प्रयास करने का प्रण करते हैं. मगर कैसे?
गहन जंगल में मार्गदर्शन के लिये सेना को पथप्रदर्शकों की आवश्यकता है. कुछ कबीले वाले अपने आप को इस कार्य के लिये प्रस्तुत करते हैं. इनका उद्देश्य है कि सेना को गलत मार्ग पर ले जाकर भटका दिया जाये. ठीक यही होता है जब एक टुकड़ी नदी की तेज धार में उलझ जाती है तो दूसरी दलदल में फ़ंस जाती है. एक अन्य टुकड़ी को मच्छरों से भरे प्रदेश में पहुंचा दिया जाता है. मच्छरों की परेशानी से रात भर अनिद्रा ग्रस्त सेना को दूसरे कहर का सामना करना पड़ता है जब मधुमक्खियाँ उनपर आक्रमण कर देती हैं.

ओर्क के सैनिक अब और सहने को तैयार नहीं हैं. एक अकेले इंसान को पकड़ने के लिये पूरी सेना भेजने के ओर्क के इस पागलपन के खिलाफ़ वे विद्रोह पर उतारू हो जाते हैं. सेना के जनरल्स भी ओर्क की आज्ञापालन करने से इंकार कर देते हैं. आखिरकार ओर्क को गद्दी से उतार फ़ेंका जाता है और राज्य में लोकतन्त्र का आगमन हो जाता है जब प्रजा अपने नेता का चुनाव करने का अधिकार पा लेती है.

इस सब में जंगलवासियों का सहयोग ही मुख्य कारण रहा होता है जिनके लिये वेताल उन्हें धन्यवाद देता है. आखिर एक भी गोली चलाये बिना एक पूरा युद्ध जीत लिया गया है. कम ही लोग हैं जो वास्तविकता से वाकिफ़ हैं. अधिकाँश के लिये तो वेताल से जुड़ी एक और नयी किंवदंती जन्म ले लेती है. जंगल में आग के किनारे गोल बांधकर कहानियाँ सुनाने वाले किस्सागो बढ़ा-चढ़ा कर सुनाते हैं कि कैसे वेताल ने अकेले दम पर पचास हजार सैनिकों की पूरी सेना को शिकस्त दे दी. ऐसा महान है वेताल.



कहानी - ली फ़ॉक
चित्र - विल्सन मकॉय
प्रथम प्रकाशन - सण्डे स्ट्रिप S048 "A Lesson for Prince Ork" (१४ अप्रैल १९५७ से १८ अगस्त १९५७ तक)

१. यह कहानी इन्द्रजाल कॉमिक्स में एक बार फ़िर प्रकाशित हुई सन १९८९ में (V26N39).
२. चित्रों के लिये बिनय, अजय, जोशुआ और आईसीसी का आभार.

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5 टिप्पणियां:

seema gupta said...

कहानी पढना अच्छा लगा... बेताल की यादें ताजा हो आई ...बेताल और डायना की भी कहानी हुआ करती थी ....अगर आपको याद हो और उपलब्ध हो तो सुनाने का अनुरोध है "

Regards

Arvind Mishra said...

वेताल का करिश्मा आज भीं मन मस्तिष्क पर छाया हुआ है -वैताल जैसा कोई नही !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी कहानी! जितनी बार पढ़ो नई लगती है

Anonymous said...

Bahut badiya. aapne acha likha hai, ye main pad chuka tha lekin wapas padne mein maza aaya.Dhnyavad aapka.
-Satish

वेताल शिखर said...

आप सभी का बेहद आभार. सीमा जी, जल्द ही आपको डायना की भी कहानी पढ़ने को मिलेगी.