Friday, January 4, 2013

वेताल की चर्चा आज के दैनिक भास्कर में

आज के दैनिक भास्कर के साथ वितरित बच्चों की पुस्तिका बाल भास्कर के मुख पृष्ठ पर नजर पड़ी तो सुखद आश्चर्य हुआ. कॉमिक्स किताबों से लगातार दूर होती जा रही जनरेशन के लिये कॉमिक्स पर आधारित अंक की कल्पना अच्छा काम है. जल्दी से पेज उलट पलट कर देखे तो और भी अचरज ये देख कर हुआ कि एक आर्टिकल में वेताल का भी जिक्र हुआ है. अब लम्बे समय से वेताल की कॉमिक्स का प्रकाशन देश में नहीं हो रहा है (कुछ एक अपवादों को छोड़ कर, और वो भी कोई स्टैन्डर्ड काम नहीं है)  और एक पूरी पीढ़ी उसके अस्तित्व से ही अनजान निकल गयी है.

लेकिन जैसे ही लेख पढ़ना शुरु किया, निराशा ने घेर लिया. स्पष्ट था कि लेखक महोदय (या महोदया) ऐसे विषय पर लिख रहे हैं जिसका उन्हें बेसिक ज्ञान भी नहीं है. दस-बारह लाइन के जिक्र में ही इतनी सारी तथ्यात्मक गलतियाँ. इससे तो अच्छा होता कि श्रीमान जी किसी और कैरेक्टर पर ही लिख लेते और हमारे प्यारे वेताल को बख्श देते. आह....

जरा आप भी जान लें कि क्या लिखा गया है:
"मैं हुं वेताल. दोस्तों का दोस्त और दुष्टों का दुश्मन. मेरे हाथ में है स्वास्तिक का निशान और दूसरे में खोपड़ी भी है. स्वास्तिक का निशान दोस्तों के लिये और खोपड़ी का दुश्मनों के लिये. रहता हुं खोपड़ीनुमा गुफ़ा में और साथ में रहते हैं चंद आदिवासी दोस्त, मेरा शेरा, जिसे लोग भेड़िया समझते हैं और मेरा घोड़ा तूफ़ान. जंगल के जानवर मेरे मित्र हैं. तभी तो मैं एक मित्र द्वीप बना पाया हूं जहाँ डॉल्फ़िन हैं, शेर हैं, भालू और चीते भी हैं. मेरी गुफ़ा के पास फ़ुसफ़ुसाते कुंज हैं. मुझे चलता-फ़िरता प्रेत भी कहा जाता है. मुझे ली फ़ॉक ने बनाया था. वैसे मुझे फ़ैंटम कहते हैं."

अब कोई बताये जनाब को कि दोस्तों के लिये सुरक्षित शुभ चिह्न कोई स्वास्तिक का निशान नहीं है बल्कि विशेष तरीके से रखी हुई तलवारों के दो युग्म हैं. वेताल के विशिष्ट प्रतीक चिह्न (खोपड़ी का निशान और शुभ चिह्न) उसके हाथ में नहीं बल्कि उन ऐतिहासिक अँगूठियों पर उभरे हैं जो सदा उसकी उंगलियों में रहती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी पिता से बेटे को स्थानांतरित होती आई हैं. पर चलिये इतनी बारीकी को जाने देते हैं.

आगे वेताल के घर के बारे में जो लिखा गया है उससे ऐसा आभासित होता है कि दोस्त आदिवासी खोपड़ीनुमा गुफ़ा में उसके साथ ही रहते हैं, सच्चाई इससे परे है. बौने बांडार आसपास जरूर रहते हैं पर ठीक वेताल की गुफ़ा में नहीं. लेखक महोदय शेरा से भी ज्यादा परिचित नहीं लगते पर उसका जिक्र बड़े जोश से करते हैं. जनाब फ़रमाते हैं कि लोग उसे भेड़िया समझते हैं. नहीं हुजूरेआला! लोग उसे भेड़िया समझते नहीं है, वो एक उम्दा नस्ल का पहाड़ी भेड़िया ही है और लोग उसे कुत्ता समझने की भूल करते हैं.

और, जंगल के जानवर कभी वेताल के मित्र नहीं रहे मेरे दोस्त. आप टार्जन से वेताल को कन्फ़्यूज न करें. जहाँ तक मित्र द्वीप का प्रश्न है वेताल ने उसे ऐसे जानवरों से आबाद किया है जो अलग अलग समय पर परिस्थिति विशेष में वहां लाए गये हैं. चाहे फ़्ल्फ़ी शेर की बात हो या गंजू गोरिल्ला (ओल्ड बाल्डी) की. स्टेगी डॉयनोसॉर हो, हज्ज नामक अजीब प्राणी या फ़िर स्ट्रिप्स (हिंदी में धारीदार) नामक बाघ. इन सबकी एक अलग कहानी है अपने पुराने घर से मित्र द्वीप तक पहुंचने की. इन्हें जंगल से समेट कर वहां एकत्र नहीं किया गया है.

मित्र द्वीप में भालू और चीते भी हैं, ये बात मुझे तो नहीं पता थी. हाँ, हिरण, जिराफ़, जेब्रा आदि तो देखे हैं. पता नहीं किस वेताल और किस मित्र द्वीप का किस्सा बयान कर रहे हैं मित्रवर.

पता नहीं लोग जिस विषय में जानते नहीं उसके बारे में इतने अधिकार पूर्वक लिखने का साहस कैसे जुटा लेते हैं? बच्चों को गलत जानकारियाँ तो मत दीजिये.

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8 टिप्पणियां:

Ravishankar Shrivastava said...

ये (हिंदी) अखबार वाले पैसा देकर किसी प्रोफ़ेशनल से आमतौर पर नहीं लिखवाते. टेबल पर बैठे उनके रिपोर्टर हर विषय में हाथ मारते रहते हैं तो ऐसा अधकचरा लेखन ही होगा!

TPH said...

सही कहा रविशंकर जी आपने. और इंटरनेट से कुछ भी उठा कर छाप देना इनका अधिकार है, साभार इंटरनेट लिखकर. कॉपीराइटेड मटेरियल का इस तरह बिना अनुमति व्यावसायिक इस्तेमाल करना कहाँ तक उचित है?

PD said...

हा हा हा हा.. वेताल का ऐसा रूप. शायद किसी नए कैरेक्टर को पैदा करने के फिराक में होंगे भाई साब. जैसा कि अधिकाँश भारतीय कामिक्स कैरेक्टर किसी दुसरे कैरेक्टर का नक़ल होता है.

वेताल शिखर said...

दुखद स्थिति है मगर एकदम सच है आपकी बात पीडी भाई. रचनात्मकता की कमी झलकती है भारतीय कॉमिक्स में. विदेशी चरित्रों के भारतीय संस्करण ज्यादा बनते हैं यहाँ पर वो बात नहीं.

मगर ली फ़ॉक के रचे दोनों चरित्रों (मैण्ड्रेक और वेताल) में ये खूबी थी कि वे पूरी दुनिया में पढ़े और सराहे गये. यूरोप से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक और ब्राज़ील से भारत तक. इतनी विविध सभ्यताओं में अपनी लोकप्रियता कायम की और आज भी याद किये जाते हैं.

पधारने का शुक्रिया.

सतीश सक्सेना said...

शुक्रिया आपका ...

Anirudh Henry said...

bravo! keep the good work on...all the best and God bless you!

Vyoma Mishra said...

ऐसी मूर्खताएँ देखकर बहुत पीड़ा होती है

Vyoma Mishra said...

क्या कभी श्री श्री श्री गौरव आर्य जी हम जैसे अति साधारण लोगों से मुखातिब होंगे...?