Tuesday, August 4, 2009

चंबल की घाटियों में दहकता प्रतिशोध

वह बचपन की एक उदास धुंधली शाम थी। जब क्षितिज से सुरमई धुआं उठने लगता और घरों में साठ वाट के बल्ब की पीली रोशनी चमकने लगती थी। शाम को परिवार के बड़े घर लौटते तो कुछ नया घटित होने का चस्का भी रहता था। बड़े भाई के हाथ में इंद्रजाल कॉमिक्स का नया अंक देख लिया तो फिर क्या कहना, बस इस बात का झगड़ा रहता था कि कौन पहले पढ़ेगा। ऐसी ही एक शाम आज भी स्मृति में बसी हुई है। इस बार इंद्रजाल कॉमिक्स के कवर पर एक अनजान शख्स था। शीर्षक था, लाल हवेली का रहस्य। किरदार था, बहादुर। यह थी बहादुर सिरीज की पहली कॉमिक्स। हिन्दी और गुजराती के लेखक और चित्रकार आबिद सूरती ने इस सिरीज के आरंभ के तीन टाइटिल को किसी क्लासिक जैसी ऊंचाइयां दी थीं। ये तीन कहानियां बहादुर के किरदार और उसके वातावरण के विकास को सामने रखती थीं।


यह बिल्कुल नया अनुभव था। यहां गांव था, गली में भौंकते कुत्ते थे। चंबल की नदी, पुल और डकैत थे। मां थी। प्रतिशोध की तपिश थी। आम नायकों से हटकर हम पहली ही कड़ी में बहादुर को एक भटके हुए इनसान के रूप में पाते हैं। जिसका पिता एक डकैत था और उसे ही वह अपना आदर्श मानता था। उसने अपनी मां को वचन दिया था कि अपने पिता के ह्त्यारे इंस्पेक्टर विशाल को खत्म करके वह अपना प्रतिशोध पूरा करेगा। वह अपने घर में साइकिल के पाइप से देसी बंदूक तैयार करता है। कहानी की शुरुआत में ही अद्भुत ड्रामा था। डकैत पूरे गांव मे लूटपाट करते हैं मगर लाल हवेली की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखते। विशाल हवेली के भीतर मां और बेटे के संवाद अजीब सा एकालाप रचते हैं। मां बाहर गोलियों की आवाज से थोड़ा भयभीत होती है, तो बेटा कहता है कि फिक्र मत करो यहां कोई नहीं आएगा।

कहानी मे आगे बहादुर एक डकैत से वादा करता है कि वह अपना प्रतिशोध लेकर बीहड़ों में आ जाएगा। कहानी के एक लंबे नाटकीय मोड़ में विशाल खुद बहादुर के पास निहत्था पहुंचता है। इंस्पेक्टर विशाल उसे उन जगहों पर जाता है जहां बहादुर के पिता के अत्याचार निशानियां अभी भी मौजूद हैं। बहादुर के भीतर से अपने पिता की रॉबिनहुड छवि टूटती है। अंर्तद्वंद्व के गहरे क्षणों से गुजरने के बाद वह तय करता है कि पिता के गुनाहों का प्रायश्चित करने का एक ही उपाय है कि वह खुद को डकैतों के खिलाफ खड़ा करे। गांव मे एक बार फिर डकैतों का हमला होता और इस बार लाल हवेली से गोली चलती है।


यह दुर्भाग्य था कि आबिद सूरती जैसे कलाकार को वह शोहरत नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। उनकी यह कॉमिक्स किंग फीचर्स सिंडीकेट की कई चित्रकथाओं पर भारी पड़ती थी। कॉमिक्स की पटकथा और चुटीले संवाद आबिद सूरती के होते थे और चित्र गोविंद ब्राह्रणिया के। यहां मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि बहादुर किरदार मुझे उसी वक्त कर पसंद आया जब तक आबिद उससे जुड़े रहे। इसके बाद जगजीत उप्पल (शायद यही नाम था) बहादुर को लिखने लगे और वह बहुत खराब हो गया। यहां तक कि गोविंद के चित्रों में भयंकर रूप से कल्पनाशीलता का अभाव दिखने लगा। बहादुर ने शहरों का रुख कर लिया, जासूसी किस्म की हल्की-फुल्की कहानियों के बीच वह किरदार फंसकर रह गया।

आबिद में ऐसी क्या खूबी थी इस बारे में मैं कुछ लिखना चाहूंगा। सबसे बड़ी बात उन्हें फ्रेम दर फ्रेम अपनी बात को एक नाटकीय विधा में कहने की कला आती थी। सिनेमा की शाट्स टेक्नीक का उन पर गहरा प्रभाव था। उन्हें पता था कि फ्रेम के भीतर किस आब्जेक्ट को हाईलाइट करना है। पहली ही कॉमिक्स में हम देखते हैं चंबल का विशाल कैनवस, उड़ती धूल और दौड़ते घोड़े। गांव के चित्रण में वे छोटी-छोटी बारीकियों का ध्यान रखते थे, गोलाबारी के दौरान भौंकते कुत्ते तक का... कुछ जगहों पर उन्होंने आंखों को एक्स्ट्रीम क्लोजअप की स्टाइल में चित्रित किया था जो मुझे आज भी याद है। आबिद की भारतीय जनमानस और स्थानीयता पर गहरी पकड़ थी।

कुछ साल पहले लखनऊ में हुई एक मुलाकात में आबिद ने बताया कि जीवन के आरंभिक दिनों के संघर्ष में उन्होने बतौर क्लैप ब्वाय काम किया, और सिनेमा एडीटिंग की बारीकियां सीखीं जो बाद मे कहानी कहने की कला में उनके ज्यादा काम आया। उन्होंने कुछ समय शायद बतौर पत्रकार भी काम किया था, लिहाजा बहादुर के परिवेश के लिए उन्होंने काफी शोध किया था। उन दिनों चंबल मे डाकुओं का काफी आतंक था, वहां आई खबरों से ही उन्हें उस परिवेश को चुनने का आइडिया मिला।


बहादुर की कॉमिक्स में कुछ बड़े ही दिलचस्प किरदार मिले। इसमें उसकी प्रेमिका बेला, सुखिया, मुखिया जैसे तमाम लोग थे। इनमें से सुखिया मुझे बहुत पसंद था। एक घरेलू और बूढ़ा आदमी जिसके परिवार को डकैतों ने खत्म कर दिया बाद में नागरिक सुरक्षा दल का एक कड़क कैडेट बन जाता है। बहादुर ने जिस जीवन को एक्सप्लोर किया था, उसमे आज भी बहुत संभावनाएं हैं। कुछ-कुछ डोगा कॉमिक्स ने इसे पकड़ने की कोशिश की थी मगर वह बात नहीं बन पाती, उसमें बहुत ज्यादा मेलोड्रामा है तो वह बी-ग्रेड फिल्मों के स्तर तक ही पहुंच पाता है।

एक्स्ट्रा शॉट्स

आबिद सूरती ने कुछ और बहुत दिलचस्प कॉमिक्स तैयार किए थे। इनमें से दो मुझे ध्यान हैं इंस्पेक्टर आजाद और इंस्पेक्टर गरुड़। इनका परिवेश अक्सर ग्रामीण या कस्बई होता था। लोगों का रहन-सहन पोशाक और कैरेक्टराइजेशन बहुत दिलचस्प थे। इंस्पेक्टर आजाद की कुछ कॉमिक्स बाद मे गोवरसंस कामिक्स जो मधुमुस्कान वाले निकालते थे छापी थी, पर शायद वह पापुलर नहीं हो सकी। इंस्पेक्टर आजाद सिरीज में उन्होंने आजादी से पहले भारत में रहने वाली एक लुटेरा जनजाति पिंढारियों पर आधारित एक कॉमिक्स लिखी थी जो बेहद दिलचस्प थी।


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6 टिप्पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहादुर खूब याद है खूब पढ़ा है।

Comic World said...

दिनेश/मनीष जी ये बात सही है की आबिद जी वो शोहरत नहीं मिल सकी जिसके वो हक़दार थे,आबिद जी की सभी कृतियाँ बहादुर,आज़ाद,
विक्रम,शुजा और गरुण रोचक और हृदयस्पर्शी थीं.बहादुर को चूँकि इंद्रजाल जैसा बड़ा कैनवास मिला इसलिए आबिद जी की कॉमिक्स के रूप में मशहूर रचना को याद करने पर बहादुर की ही याद आती है,पर यहाँ मैं आबिद जी एक और मशहूर और शायद सर्वश्रेष्ठ कृति के बारे में बात करना चाहूँगा और वो है इंसपेक्टर आज़ाद जो की सबसे पहले Illustrated Weekly of India में प्रकाशित होना शुरू हुई थी और बाद में 'सत्यकथा' जैसी पत्रिकाओं में धारावाहिक के रूप में भी प्रकाशित हुई.
आज़ाद से शोमैन 'राज कपूर' बड़े मुतास्सिर थे और इस पर फिल्म बनाने के लिए उन्होंने आज़ाद की एक कहानी 'दौड़' के लिए आबिद जी को अनुबंधित भी कर लिया था जो की राज कपूर की महत्वकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के बाद बनने वाली थी,आबिद सातवें आसमान पर थे पर हालातों ने ऐसा मोड़ लिया के राज जी ने मेरा नाम जोकर की असफलता को पाटने के लिए 'बॉबी' शुरू कर दी और आबिद जी को इंतजार करने को कहा,'बॉबी' बनी पर 'दौड़' शुरू नहीं हो पाई.आबिद इंतजार करते रहे और बाद में ये project हमेशा के लिए लटक गया.यही वो समय था जब आबिद जी ने 'बहादुर' से हाथ खींच लिए थे अपना पूरा समय 'दौड़' की पटकथा को देने के वास्ते.
बहरहाल,मुझे आज़ाद की 'दौड़' वाली कॉमिक पढने का सौभाग्य एक दोस्त के मार्फ़त हुआ है और पढ़ने के बाद मैं ये दावे से कह सकता हूँ के 'दौड़' आबिद जी की यकीनन सर्वश्रेष्ठ कृति है,ये वो कहानी है जिसके बाद आबिद जी की कलम से इसके जोड़ की कोई दूसरी कहानी नहीं निकली,
'प्रताप मुलिक' के उच्चस्तरीय चित्रों से सजी इससे बेहतर कोई दूसरी रचना आबिद जी की कम से कम मैंने तो नहीं पढ़ी.राज कपूर सचमुच पारखी नज़र रखते थे इसीलिए तो हीरे को झट पहचान लेते थे.
विक्रम,शुजा और गरुण अपेक्षाकृत कमज़ोर रचनायें है पर दुसरो से कई गुना बेहतर,'उप्पल' जी के बहादुर से तो कई गुना बेहतर.
दिनेश जी आपने कॉमिक के पन्नो के चित्रों की बोली खूब समझी है और काफी अच्छी तरह उसे व्यक्त किया है,आबिद जी के लिखने के अंदाज़ को भी काफी गहरायी से पहचाना है आपने.बधाई.
मनीष आपको भी बधाई दिनेश जी जैसे सुधि लेखकों को इस ब्लॉग से जोड़कर.

वेताल शिखर said...

बेहद रोचक अंदाज में लिखा है आपने. आनंद आया.

मैं इस बात से सहमत हूं कि आबिद जी के बहादुर से अलग होने के बाद जगजीत उप्पल कहानियों का वो स्तर बरकरार नहीं रख पाये. एक-दो को छोड़कर उनकी बाकी कहानियां बड़ी सामन्य किस्म की हैं.

मार-धाड़ और हिंसा की अतिरंजिता ने बहादुर के किरदार को उस ऊंचाई से नीचे ला दिया जो कभी बहादुर की पहचान होती थी. अगर आप बाद की कहानियों को देखें तो कुछ ऐसे तत्व भी दिखाई देते हैं जो किसी भी लिहाज से शोभनीय नहीं कहे जा सकते. १९९० में जब इन्द्रजाल कॉमिक्स अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये संघर्ष कर रही थी तब एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में एक कहानी में बेला को काफ़ी कम (या शायद बिल्कुल नहीं) वस्त्रों में दर्शाया गया. आश्चर्य नहीं कि यह कहानी बहादुर की अंतिम कहानी साबित हुई.

वेताल शिखर said...

@CW: बढ़िया सप्लीमेंट दिया है दोस्त. कॉमिक्स और फ़िल्में, दोनों ही क्षेत्रों में तुम्हारी स्तरीय जानकारियों से हम लोग लाभ उठाते रहेंगे.

दिनेश जी के अन्य ब्लॉग्स का भ्रमण करने की सिफ़ारिश करूंगा. सेटिस्फ़ेक्शन की गारंटी मेरी. :-)

उनका ये ब्लॉग भी देख लेना:
http://indianbioscope.blogspot.com

Ananyo said...

TO WHOM IT MAY CONCERN

Respected Sir,

I am Executive Producer of a Production House, PARIVAR ENTERTAINMENT PVT. LTD. based in Kolkata, west Bengal, INDIA. I want to prepare 2D Animation series based on stories of 'Betal', 'Mandrake' and 'Bahadur' in Bengali for Bengali Satellite Television Channels which will run for 26 weeks in 26 episodes. This will be an effort to re-popularize the stories of above mentioned characters to the current generation.

Please help me to know who is the copyright owner of the stories of above characters and how do I get the permission to make the animation series for Television.

Please inform me in the following mail address asap : fourpoint.kolkata@gmail.com

Thanking you,
Yours faithfully,
PARIVAR ENTERTAINMENT PVT. LTD.,
Ananyo K. Dasgupta

The Phantom Head (TPH) said...

Ananyo: King Features Syndicate is the copyright owner of most of the your mentioned characters. You can contact them here:

http://www.kingfeatures.com/contact.htm